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ईटिंग डिसऑर्डर समस्या से संबंधित कंटेंट को बढ़ावा देता सोशल मीडिया

प्रस्तोता- अमृता तिवारी

सार – Techनीति के इस एपिसोड में जानिये कैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ईटिंग डिसऑडर्स और बॉडी इमेज समस्याओं को बढ़ावा दे रहे हैं

विस्तार- “Techनीति ” में आपका स्वागत है, यह पॉडकास्ट एक मंच है जहां हम वैश्विक डिजिटल मुद्दों को समझते हैं, और प्रत्येक विषय और घटना के पीछे ‘क्यों’ को जानने की कोशिश करते हैं। मैं हूँ आपकी मेज़बान, अमृता और आज हम देखेंगे कि कैसे, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, टिकटॉक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स,  युवाओं और खाकर बच्चों में अपने शरीर को लेकर असुरक्षा और ईटिंग डिसऑर्डर्स जैसे खतरनाक प्रिवर्तियों को बढ़ावा दे रहे हैं।

 यह कोई रहस्य नहीं है कि विश्वभर की सरकारें इन बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की तानाशाही की आलोचना करती रही हैं क्योंकि ये बच्चों और किशोरों पर प्रभाव डालने वाले हानिकारक कंटेंट को संबोधित करने में असफल रहे हैं। इन प्लेटफॉर्म्स पर ऑनलाइन उत्पीड़न और बलात्कार से लेकर आत्म-हत्या तक, युवाओं पर दुषप्रभाव डालने वाले संवेदनशील मुद्दों से जुड़े कंटेंट की कमी नहीं है। लेकिन एक विशेष पहलू जो हमारा ध्यान मांगता है, वह है एक पतला और दुबला शरीर प्राप्त करने के लिए ईटिंग डिसऑर्डर्स से सम्बंधित कंटेंट के प्रचार की।

 अप्रैल 2022 में, “डिजाइनिंग फॉर डिसऑर्डर: इंस्टाग्रामस प्रो ईटिंग डिसऑर्डर बबल” नामक एक रिपोर्ट जारी हुई थी , जो इन प्लेटफॉर्मस पर ईटिंग डिसऑर्डर्स और बॉडी इमेज इश्यूज  सम्बंधित कंटेंट के प्रचार की जानकारी देती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, यह रेकमेंडेशन् एल्गोरिदमस युक्त – सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स युवा पीढ़ी के मानसिक और सामान्य स्वास्थ्य पर गहरा असर डालते हैं।

मेजबान: एक पूरे साल से भी अधिक समय बीत चुका है जब एक पूर्व फेसबुक कर्मचारी ने एक आंतरिक रिपोर्ट लीक की, जिसमें ईटिंग डिसऑर्डर्स से संबंधित कंटेंट को बढ़ावा देने के बारे में चौंकाने वाली तथ्य सामने आये | रिपोर्ट के मुताबिक, आश्चर्यजनक रूप से, हर तीसरी टीन एजेर ने यह स्वीकार किया कि इंस्टाग्राम ने उनको अपने शरीर को लेकर असुरक्षा महसूस करने पर मज़बूर किया |

 सोचने वाली बात यह है कि सोशल मीडिया शरीर के बारे में हमारी धारणा पर इतना गहरा प्रभाव कैसे डालता है? इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, फेसबुक और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स आजकल किशोरों के रोज़ मर्रा के निर्णयों को आकार देने में  बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दुर्भाग्य से,  इन प्लेटफॉर्म्स पर ऐसा कंटेंट देखने की वजह से कई युवाओं के मन में आदर्श शरीर के आकार और वज़न को लेकर  गलत धारणाएं बन गयी हैं | वे इस बात पर बड़ी गंभीरता से ध्यान देते हैं कि उन्हें ऑनलाइन कैसे माना जाता है, वे अक्सर गोरा और पतला दिखने के लिए फ़िल्टर का उपयोग करते हैं, जिससे शारीरिक विकृति यानि बॉडी डिमोर्फ़िआ को बढ़ावा मिलता है।

 क्या आपने कभी एनोरेक्सिया नर्वोसा का नाम सुना है ? यह सबसे प्रचलित ईटिंग डिसऑर्डर्स में से एक है। एनोरेक्सिया में शरीर के वज़न को बेहद कम बनाए रखने का एक अस्वस्थ जुनून, वज़न बढ़ने का तीव्र डर और वज़न और आकार की एक अवास्तविक धारणा बन जाती है। एनोरेक्सिया से पीड़ित व्यक्ति अपने वज़न और आकार को नियंत्रित करने के लिए अत्यधिक तरीकों का सहारा लेते हैं, जिसमें कैलोरी का सेवन सीमित करना, विशिष्ट खाद्य पदार्थों में कटौती करना यहां तक कि उल्टी को प्रेरित करना भी शामिल है। ईटिंग डिसऑर्डर के परिणाम काफ़ी चिंताजनक हो सकते हैं, जिससे पोषण संबंधी कमी और कार्डियक अरेस्ट जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं होने का भी डर रहता है।

 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ईटिंग डिसऑर्डर्स से सम्बंधित कंटेंट  को बढ़ावा देने के खिलाफ निर्देश तो हैं पर उनको लागू करने में काफी ढिलाई बरती जाती है। उदाहरण के लिए, इंस्टाग्राम में #थिन्स्पिरेशन जैसे हैशटैग की खोज करने पर एक चेतावनी मिलती है, लेकिन अजीब बात यह है कि यूज़र्ज को दो विकल्प दिए जाते हैं: ” सपोर्ट प्राप्त करें” या “फिर भी रिजल्ट देखें”। जैसे ही आप दूसरा विकल्प चुनते हैं, #थिन्स्पिरेशन , #थिन्स्पो, #स्लिमिंगवर्ल्ड, #स्किनी और काफी सारे ऐसे ही हैशटैग्स से सम्बंधित कंटेंट की बाढ़ आ जाती है। वायरल ट्रेंड्स जैसे प्रसिद्ध “A4 चैलेंज” जो यह बताते हैं कि क्या कोई A4 साइज के कागज़ से पतला है या नहीं, आजकल सोशल मीडिया पर काफी मशहूर हैं और युवाओं को अपनी ओर आकर्षित करते हैं । रचनात्मक हैशटैगस और  शार्ट फॉर्म्स इन प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम को लांघ जाते हैं और यूज़र्स की फीड पर सम्बंधित कंटेंट को दिखते हैं |

 बड़ी हैरानी होती है जब रिपोर्टस ये बताते हैं कि 9 -10 साल के बच्चे तीन से ज़्यादा ऐसे एकाउंट्स को फॉलो करते हैं जो ईटिंग डिसऑर्डर्स युक्त कंटेंट दिखाते हैं | हालाँकि टर्म्स एंड कंडीशंस के हिसाब से कोई भी बच्चा जिसकी आयु 13 वर्ष से कम हो, इन प्लेटफॉर्म्स पर रजिस्टर नहीं कर सकता |

मेजबान: समय आ गया है की यह बड़ी टेक कम्पनीज़  मुनाफे के अलावा किशोरों और बच्चों तक सही कंटेंट पहुंचने के बारे में भी सोचें। वे युवा और किशोरों के तनाव  को बढ़ाने वाली कंटेंट को हटाने के लिए अपनी ज़िम्मेदारी को नज़रअंदाज नहीं कर सकते हैं। ज़रूरी है की हम इन कमापनियों को इनके कंटेंट के लिए ज़िम्मेदार ठहरायें और अनुचित कंटेंट दिखने वाले एल्गोरिदम के लिए जवाबदेह बनाएं ।

 आज के एपिसोड में इतना ही ‘Techनीति ‘ को सुनने के लिए धन्यवाद।

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